Thursday, March 11, 2010

२०१० का जन जागृति सेवा सदभावना सम्मान

प्रदीप श्रीवास्तव कों सन २०१० का जन जागृति सेवा सदभावना सम्मान से सम्मानित करते हुए कर्णाटक उच्च नायालय के पूर्व न्यायधीश श्री वाई भास्कर राव एवम मानवाधिकार आयोग के सदस्य ई स्माइल तथा डॉ अर्चना सिंह

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प्रदीप श्रीवास्तव कों सन 2010 का

जन जागृति सेवा सदभावना सम्मान

हैदराबाद ,२१ फरवरी की रात हैदराबाद के पोट्टी श्रीरामलू तेलगु विश्व विधालय के सभागार में भारतीय संस्कृति परिषद् ,हैदराबाद एवम राष्ट्रिय एकता लेखक व पत्रकार संघ के तत्वावधान में हर वर्ष दिया जाने वाला जन जागृति सेवा सदभावना सम्मान इस वर्ष का निज़ामाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक स्वतंत्र वार्ता के स्थानीय संपादक प्रदीप श्रीवास्तव कों सन २००९-१० के लिए दिया गया. यह सम्मान उन्हें कर्णाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति वाई भाष्कर राव , मानव अधिकार कमीशन आंध्र प्रदेश के सदस्य ई. इस्माइल एवम अंतराष्ट्रिय मानवाधिकार संघ के आंध्र प्रदेश की अध्यक्ष डॉ अर्चना सिंह ने शाल ,सम्मानपत्र ,हैदराबादी मोतियों की माला एवम स्मृति चिन्ह दे कर सम्मानित किया. अवसर था राष्ट्रिय एकता एवम आचार्य चाणक्य तथा जनजागृति सेवा सदभावना पुरस्कार समारोह,व वन्देमातरम और राष्ट्रीय एकता पर संगोष्ठी का. पता हो की बीते १८ सालों से जन जागृति सेवा सदभावना सम्मान दिया जा रहा है. यह सम्मान समाचार,सूचना ,मिडिया एवम जनसंपर्क से जुड़े लोंगों कों दिया जाता है.जबकि राष्ट्रिय एकता सदभावना सम्मान समाज सेवा से जुड़े तथा आचार्य चाणक्य सदभावना सम्मान न्याय क्षेत्र से सम्बंधित लोगों कों प्रदान किया जाता है.इस अवसर पर "वन्दे मातरम और राष्ट्रिय एकता "विषय पर एक संगोष्ठी का भी आयोजन किया गए ,जिसकी अध्यक्षता प्रदीप श्रीवास्तव ने की.जिनका कहना था कि अगर सही मायने में देखा जाये तो हिंदी भाषा ही पूरे देश कों एक सूत्र में बांधती है.चाहे वह पूरब से पश्चिम हो या उत्तर से दखिन हो ,हिंदी ही राष्ट्रिय एकता का प्रतीक है,इसे मानना होगा. वही डॉ अर्चना सिंह का कहना था कि राष्ट्रिय एकता कि बात पर हमें अपनी सेना ,पुलिस व अन्य सुरक्षा कर्मियों पर गर्व होता है.जिनके कारण हम खुली हवा में साँस ले पाते हैं .अन्य वक्ताओं मे संदीप अग्रवाल,अमृत कुमार जैन,पंडित गणेश देव आर्य ,पंडित बालकृष्ण पाठक ,प्रमोद जैन,डॉ हरीश चन्द्र विद्यार्थी ,आर.बी. सिंह,डॉ वसुधा शास्त्री आदि ने भी अपने विचार रखे.

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