Tuesday, August 3, 2010

राम जमभूमि बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला

राम जमभूमिबाबरी मजिद मामले की सुनवाइ आखिरकार साठ सालों बाद पूरी हो ही गयी अब सितबर के अत तक इस पर फसला सुनाने की घोषणा की जा चुकी है। वातव में यह मामला या उसके समत करणों एव वादों का समावेश करता है ? या इस सभावित निणय से इस समया का यायिक समाधान सभावित है ? जब इस पर विचार होगा तो थिति यही है कि इस कार के करण में दो कार के मामले यायालय में विचाराधीन है। एक विवादित थल के वामिव का आर दूसरा विवादित ढाचे के विवस का। इसमें एक ही सुनवाइ जो पूरी हइ है, उसकी शुआत १९५० में हइ थी, जब २२/२३ दिसबर १९४९ की रात के बाद यह घोषणा की गयी कि यहा रामलला का ाकटय हो गया है। थानीय शासन ने विवादों आदोलनों से बचने के लिए इसे दड किया सहिता की धारा १४५ के तहत कुक कर लिया। कुकी के बाद इसे फजाबाद नगरपालिका के तकालीन अयक्ष यािदाराम की सुपुदगी में दे दिया गया था। इसकी सुनवाइ के दारान ही यह पाया गया कि इसके वामिव का निधारण धारा १४६ के अतगत दीवानी यायालय को साप दिया जाये। इसके बाद रामलला के भोग, राग, आरती, पूजापाठ तथा रामलला की मूति हटाये जाने के ाथनाप गोपाल सिंह विशारद ारा दिया गया था, जिस पर सब जज वीर सिंह ने अथाइ निषेधाज्ञा ारा मूति हटाने नियमित पूजापाठ के आदेश पारित किये थे। इसे रिसीवर ारा सप कराया जा रहा था। वामिव के निधारण के बाद में जिला मजिटेट फजाबाद आर राय सरकार को भी नियमानुसार पक्ष बनाया गया था। बाद में इसमें कइ नये मामलों का समावेश होता रहा। इहीं मामलों में सुी सेंटल वफ बोड ने वामिव सबधी वाद १९ दिसबर १९६१ को मियाद की सीमा खम होने के ऐन पर इस भय से दायर किया कि दूसरा पक्ष यदि अपना वाद वापस ले ले तब थिति तिकूल हो सकती ह। इस कार इसका वामिव सबधी अधिकार गहित हो जायेगा। यह मामला ३९ वषा] तक फजाबाद की जिला अदालत में विचाराधीन रहा। इस बीच निणय की ओर कोइ गति नहीं हो पायी। १९८९ में राय सरकार के ाथनाप पर यह मामला हाइकोट की बडी बेंच के सामने चला गया। इसी बीच १९८९ में ही विव हिंदू परिषद के नेता यायालय के पूव यायाधीश देवकीनदन अगवाल ने पहली जुलाइ को रामलला के मि के मेंरामलला विराजमानका नया मामला दायर किया जिसका मुय तव यह था कि यह दावा रामलला विराजमान की ओर से दायर किया गया, हालाकि इसी कार का एक मामला १९७८ में रामलला विराजमान रामजमभूमि मदिर को वादी बनाकर एक महत ारा दायर किया था जो १९८३ में खारिज हो गया था।

दिसबर १९९२ को विवादित ढाचे का विवस हआ। के सरकार ने तीन जनवरी १९९३ को विवादित थल सहित आसपास की भूमि का अधिगहण कर लिया, जिसे इमाइल फाखी बनाम यूनियन आफ इडिया मामले में सर्वो यायालय में चुनाती दी गयी आर यह तक दिया गया कि यह धामिक थल ह। इसका अधिगहण नहीं किया जा सकता ह। सर्वो यायालय की वेंकटचलया की अयक्षता वाली पाच सदयीय खडपीठ ने के सरकार ारा किये गये अधिगहण को वध ठहराया आर यह निर्देश दिया कि २७७ एकड भूमि जिसमें विवादित थल अवथित था, के वामिव निधारण का मामला पहले निर्णीत होना चाहिए। इसमें १९५० से लेकर १९८९ तक दायर सभी पाच मामले थे जिसमें परमहस रामच दास ने फसले में विलब के नाम पर अपना वाद वापस ले लिया था। शेष चार मामले पीठ के समक्ष विचाराधीन थे, उनमें लगभग सा वाद बिंदु बने, जिन पर सुनवाइ होनी थी। इसमें मुय यह था कि विवादित इमारत मदिर या मजिद ? यह कब आर किस कार बनी ? या इसका निमाण मदिर तोडकर किया गया ? या हिंदू निरतर इसे राम जमभूमि मानकर पूजा करता रहा आर उसका कजा भी था ? या १८८५ में निर्मोही अखाडे के बाबा रघुवरदास बनाम सरकार के फसले के कारण मुकदमा दायर करने का अधिकार खो दिया ? या मुसलमान १९४९ के पहले से ही इसे मजिद के में इतेमाल नहीं कर रहे थे, जिससे मुसलमानों का मुकदमा निधारित अवधि सीमा के बाहर ? इस सारे सग के विविध बिदुआें का निधारण सायों के आधार पर होना था। इस मामले में कुल सभी पक्षों ारा ८४ साय तुत किये गये जिसमें १९ सेंटल सुी वफ बोड की ओर से थे।यह वातव में हिंदुआें आर मुसलमानों के बीच तिनिधिक चरि वाला मामला था जिसका कारण दोनों ही समुदायों में से कोइ भी यदि किसी समझाते या निणय से असतु हो तो इसमें पक्ष बन सकता है। इसी के साथ ही राय सरकार आर जिला मजिटेट जो दीवानी मामले के आवयक पक्ष थे, उनकी ओर से २५ अल १९५० को जिला मजिटेट जयकरनाथ उग ने जवाबदावे में यह वीकार किया था कि यह मजिद आर इसी में मुसलमान इसका इतेमाल करते आये ह। यह मदिर के में कभी इतेमाल नहीं हइ मूति रखे जाने के पूव पिछले शुकवार को इसमें जुमे की नमाज पढी गयी थी। २२ दिसबर की रात कुछ लोगों ने शरारतपूण ढग से यहा पर मूति रख दी, जिसकी पु तकालीन पुलिस अधीक्षक ने भी की थी। चूकि यह तय सबधी बयान था इसलिए बाद में राय सरकार चाहते हए भी इस सबध में अपना पक्ष परिवतित नहीं कर पायी। यह मजिद वातव में शियाआें ारा निमित थी लेकिन यह सुी वफ बोड की सपा के में दज थी। अब अदालत के फसले की तीक्षा इस बात को लेकर हो रही कि कान सा माणित वाद बिंदु है जो फसले का आधार बनेगा। चूकि इसे राीय महव का मामला माना जा रहा है जिसका भाव पूरे देश पर पडने वाला , इसलिए यायालय ने दीवानी किया सहिता की धारा ८९ के तहत दोनों पक्षों को अलगअलग बुलाकर आपसी समझाते का भी पता लगाया। लेकिन इस दिशा में अभी तक कोइ ऐसी गति नहीं हो पायी , जिसे समाधान या फसले में सहायक माना जा सके। दोनों ही पक्ष इस बात के लिए यनशील थे कि वे यह सि करें कि वे ही सही है। एक पक्ष का कहना है कि चूकि रामलला को पक्ष ही नहीं बनाया गया इसलिए वे यहा से हटेंगे कसे ? सेंटल सुी वफ बोड का यह दावा कि यह मजिद अविवादित भूमि पर १५२८ में बनी थी, इसे बाबरी मजिद नाम दिया गया था, तबसे लेकर दिसबर १९९२ तक यह विमान थी। दूसरे पक्ष का यह यन था कि वह सि करे कि यह मदिर तोडकर बनी थी इसलिए इलामी साितों के आधार पर इसे उनका पूजा थल नहीं माना जा सकता।अब लोगों की निगाहें फसले आर उससे जुडे परिणामों की ओर है। चूकि यह मामला राजनीति से भी सीधे जुड गया है इसलिए फसले का लाभ किहें आर किस में मिल सकता , इसका आकलन भी किया जाने लगा है। यह भी मरणीय कि बाबरी मजिद के पक्षकारों की ओर से घोषणा की गयी है कि वे यायालय के फसले को मानेंगे वह चाहे पक्ष में हो या विपक्ष में, आदोलन के लिए सडकों पर नहीं उतरेंगे, लेकिन विव हिंदू परिषद ऐसी कोइ घोषणा करने में गुरेज कर रहा है मदिर पक्षों की ओर से यह बयान आया कि यह आथा का जो अदालत की सुनवाइ की परिधि से बाहर है ? इसी के साथ ही जहा तक फसले की सभावनाआें आर उसे लागू करने के का सबध , वह थिति तो सर्वो यायालय में फसले के खिलाफ हइ अपील के निणय के बाद ही आएगी, जिसे लागू करने का दायिव कें सरकार का होगा, योंकि अधिगहीत भूमि उसी की आर उसी ारा नियु रिसीवर उसकी यवथा कर रहा ह। इससे जुडे कानून यवथा से निपटने का दायिव राय सरकार का भी होगा। ये सरकारे अभी इसलिए चितित नहीं , योंकि यह निणय अतिम नहीं होगा। इसके खिलाफ सर्वो यायालय में अपील के निणय के बाद ही इसे लागू करने का उठेगा।

शीतला सिंह ,संपादक जनमोर्चा
हिंदी दैनिक ,फैजाबाद (यू.पी.)

साभार :स्वतंत्र वार्ता,आन्ध्र प्रदेश

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