Sunday, December 26, 2010

राष्ट्रपति ने किया हर्बल उद्यान का उद्घाटन

हैदराबाद। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति निलयम के परिसर में एक हर्बल उद्यान का उद्घाटन किया। यह बाग चिकित्सीय प़ेडपौधों के क्षेत्र में भारत की समृद्ध विरासत और विविधता का दिग्दर्शन कराएगा। आधिकारिक बयान के अनुसार इसका उद्देश्य विभिन्न स्थानों पर पाये जाने वाले उन पौधों के चिकित्सीय गुणों को संरक्षित रखना और प्रोत्साहित करना भी है, जो मनुष्यों केलिए लाभकारी हैं। ,००० वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले इस बाग में चिकित्सीय और सुगंधित पौधों की ११६ प्रजातियां हैं, जिनमें सर्पगंधा, कालबंध, नींबू घास, खस, जिरेनियम कोरिएंडर, चंदन, गुलाब, चमेली, कालमेघ, तुलसी और इसबगोल शमिल हैं। इन ज़डी बूटियों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के रोगों में प्राकृतिक औषधि के तौर पर किया जाता है

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लंदन से क्यों नहीं लाया जा रहा गिरवी रखा सोना

बृहत्तर भारत में सोने का भंडार लगातार ब़ढ रहा है यह सोना देश के स्वर्ण आभूषण विक्रेताआे, घरों और भारतीय रिजर्व बैंक में जमा है। विश्व स्वर्ण परिषद की रिपोर्ट के अनुसार भारत में १८ हजार टन सोने का भंडार है। स्वर्ण उपलब्धता की जानकारी देने वाली यह रपटइंडिया हार्ट ऑफ गोल्डशीर्षक से जारी हुई है। यह रिपोर्ट विश्व के तमाम देशों में सोने की वस्तुस्थिति के सिलसिले में किये गये एक अध्ययन के रूप में सामने आयी है। भारत में इस विपुल स्वर्ण भंडार की उपलब्धता तब है, जब चन्द्रशेखर सरकार के कार्यकाल, १९९१ में बैंक ऑफ इंग्लैंड में गिरवी रखा गया सोना आज तक वापस नहीं आया है। यह सोना वापस जाये तो भारत की स्वर्ण शक्ति में और वृद्धि दर्ज हो जाएगी। देश में सोने की मजबूत स्थिति ने साबित कर दिया है कि जो देश एक समय सोने की चि़डया कहलाता था, आज वही फिर सोने की चि़डया बनने की ओर प्रयत्नशील है।देश में सोने का वर्तमान भंडार दुनिया में उपलब्ध कुल सोने का ११ प्रतिशत है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसका वर्तमान मूल्य करीब ८०० अरब डॉलर है। यदि इस सोने को देश की कुल आबादी में बराबरबराबर टुक़डों में बांटा जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक के हिस्से में करीब आधा औस सोना आएगा। हालांकि प्रति व्यक्ति सोने की यह उपलब्धता पश्चिमी देशों के प्रति व्यक्ति की तुलना में बहुत कम है। पर भारतीय महिलाआें में स्वर्णआभूषणों के प्रति लगाव के चलते कालांतर में इसमें ब़ढोतरी की उम्मीद है। वैसे भी हमारे यहां के लोग धन की बचत करने में दुनिया में सबसे अग्रणी है। भारतीय अपनी कुल आमदनी का ३० फीसद हिस्सा बचत खाते में डालते हैं। इसमें अकेले सोने में १० फीसद निवेश किया जाता है। पिछली दीपावली को जब देश भर के डाकघरों में सोने के सिक्के बेचने की शुरुआत हुई तो ये सिक्के इतनी ब़डी संख्या में बिके कि सभी डाकघरों में सिक्के कम प़ड गये।धनतेरस को सोनाचांदी खरीदा जाना शुभ माना जाता है, इसलिए भी प्रत्येक दीपावली के अवसर पर सोनेचांदी की बिक्री खूब होती है। शादियों में भी बेटीदामाद को स्वर्ण आभूषण दान में देना प्रचलन में है, इसलिए सोने की घरेलू मांग हमारे देश में हमेशा बनी रहती है। भारत के स्वर्ण बाजार को ख्याल में रखते हुए विश्व स्वर्ण परिषद ने रिपोर्ट इस मकसद से जारी की है कि विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां यहां स्वर्ण आभूषण बाजार में पूंजी निवेश की संभावनाएं तलाश सकें। इसी सिलसिले में परिषद के निवेश अनुसंधान मामलों की निर्देशक एली आंग ने रिपोर्ट जारी करते हुए मीडिया के सामने कहा भी कि भारत दुनिया में सोने का सबसे ब़डा बाजार है, जहां सोने की घरेलू मांग मंदी के पहले की स्थिति में आने की संभावना है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय सरार्फा बाजार के लिए भारत बेहद महत्वपूर्ण है। वैसे सोना भारतीय समाज का अंतरंग हिस्सा है। देश में सोना जमीनजायदाद अन्य अचल संपत्तियों से महत्वपूर्ण माना जाता है। घरों में सोना रखना इसलिए भी जरूरी माना जाता है, जिससे विपरीत परिस्थिति, मसलन हारीबीमारी में उसे गिरवी रखकर रकम हासिल की जा सके। सोने में बचत निवेश लोग इसलिए भी अच्छा मानते हैं, क्योंकि इसके भाव कुछ समय के लिए स्थिर भले ही हो जाएं, घटते कभी नहीं है। लिहाजा सोने में पूंजी निवेश को अधिक सुरक्षित माना जाता है, बशर्ते चोरी हो। वर्तमान में ऊंची कीमतों के बावजूद लोग सोने में खूब निवेश करने में लगे हैं। परिषद के आकलन के मुताबिक २००९ में देश में सोने की मांग १९ अरब डॉलर तक पहुंच गयी थी। यह दुनिया में सोने की कुल मांग की १५ प्रतिशत आंकी गयी। पिछले एक दशक के सालों में सोने की घरेलू मांग में १३ फीसद प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि दर्ज की जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक में वित्तीय वर्ष २००९ में सोने का कुल भंडार ३५७८ टन था। हालांकि पिछले छह वित्तीय वषा] में रिजर्व बैंक में स्वर्ण भंडार की यही उपलब्धता चली रही है। यानी मनमोहन सरकार के छह सालों के कार्यकाल में इस भंडार में कोई इजाफा नहीं हुआ है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से जो स्वर्ण भंडार उन्हें विरासत में मिला था, उसमें राईरत्ती भी ब़ढोतरी अथवा घटोतरी नहीं हुई। देश की वित्तीय हालत खराब होने पर १९९१ में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने ६५२७ टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट में गिरवी रखवा दिया था। यह सोना १९ साल बीत जाने के बावजूद यथास्थिति में है। देश की जनता के लिए यह हैरानी में डालने वाली बात है। जबकि इस दौरान देश ने कई प्रधानमंत्री देखे हैं। गिरवी रखे गए सोने के बदले जो विदेशी पूंजी भारत सरकार ने उधार ली थी, उसका हिसाब भी चुकता हो चुका है। इसके बावजूद इतने ब़डे स्वर्ण भंडार को लंदन से वापस लाने में सरकारों ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली ? हैरानी इस पर भी है कि रिजर्व बैंक इस सोने को विदेशी निवेश मानकर देश के मुद्रा भंडार में भी दर्ज नहीं करता ? इस बाबत बैंकिंग मामलों से ज़ुडे जानकारों का मानना है कि इस सोने के प्रति जो लापरवाही बरती जा रही है, वह रिजर्व बैंक अधिनियम १९३४ की खुली अवहेलना है। इस अधिनियम के अनुच्छेद ३३ () के अनुसार रिजर्व बैंक के स्वर्ण भंडार का ८५ प्रतिशत भाग देश में रखना जरूरी है।

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