Sunday, January 23, 2011

अभी-अभी

शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी नहीं रहे
पुणे।। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के मशहूर गायक पंडित भीमसेन जोशी (90) का सोमवार को पुणे के एक हॉस्पिटल में निधन हो गया। पंडित जोशी पिछले दो साल से बीमार थे।
पंडित जोशी के निधन की खबर जैसे ही फैली लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले पं. जोशी की आवाज अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है। जोशी खय्याल गायकी और भजन के लिए काफी मशहूर थे। जोशी का जन्म वर्ष 1922 में कर्नाटक में हुआ था। पंडित जोशी को 2008 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।
पंडित जोशी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए मशहूर ऐक्टर और प्ले राइटर गिरीश कर्नाड ने कहा कि उनकी मौत से न सिर्फ उनको बल्कि देश-विदेश के संगीतप्रेमियों को गहरा दुख हुआ है।
बॉलिवुड के मशहूर म्यूजिक कंपोजर और गायक शंकर महादेवन ने कहा कि पंडित जोशी के जाने से संगीत जगत में खालीपन-सा आ गया है। मैं जोशी जी को व्यक्तिगत रूप से जानता था। वह बहुत अच्छे और संजीदा इंसान थे।
सुप्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक और भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी का लंबी बीमारी के बाद आज सुबह निधन हो गया। वे 89 साल के थे। जोशी ने पुणे के सह्याद्रि अस्पताल में सोमवार सुबह अंतिम सांस ली। उन्हें किडनी व फेफड़ों की बीमारी के चलते 31 दिसंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिछले एक हफ्ते से उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी। जोशी को वर्ष 2008 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" से सम्मानित किया गया था। दोपहर दो बजे के बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। जोशी के निधन से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के एक युग का अंत हो गया है।
देश भर में शोक की लहर
शास्त्रीय गायन को नई ऊंचाईयों पर ले जाने वाले जोशी के निधन से पूरे भारत में शोक की लहर दौड़ गई है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत अनेक राजनीतिक हस्तियों व संगीतप्रेमियों ने शोक व्यक्त किया है। जोशी के जाने से इस देश और शास्त्रीय संगीत जगत को अपूरणीय क्षति हुई है।
किराना घराने से था संबंध
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान स्तंभ भीमसेन जोशी किराना घराने के महत्वपूर्ण गायक थे। उन्होंने महज 19 साल की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था और लगभग सात दशकों तक शास्त्रीय गायन किया। पंडित जोशी 1943 में मुंबई आ गए थे और उन्होंने एक रेडियो आर्टिस्ट के रूप में काम किया। म्यूजिक कंपनी एचएमवी ने 22 वर्ष की उम्र में हिन्दी और कन्नड़ भाषा में उनका पहला एलबम रिलीज किया था।
खयाल शैली थी खास
जोशी को मुख्य रूप से खयाल शैली और भजन के लिए जाना जाता है। पंडित जोशी को वर्ष 1999 में पद्मविभूषण, 1985 में पद्मभूषण और 1972 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया था।
फिल्मों में भी किया गायन
जोशी ने कई बॉलीवुड फिल्मों के लिए भी गाने गाए। 1956 में आई बसंत बहार में उन्होंने मन्ना डे के साथ, 1973 में बीरबल माई ब्रदर में पंडित जसराज के साथ गायन किया। उन्होंने 1958 में आई फिल्म तानसेन और अनकही (1985) के लिए भी गाने गाए।
जोशी का 1985 में आया मशहूर "मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा" गाना आज भी देशवासियों की जुबां पर है। इसका जादू आज भी बरकरार है। जोशी जी द्वारा गाए गए गीत लोगों के बीच समां बांध देते थे। उनके द्वारा गाए गए गीत पिया मिलन की आस, जो भजे हरि को सदा संगीत के क्षेत्र में मील के पत्थर हैं।
1922 को कर्नाटक में हुआ जन्म
पंडित जोशी का जन्म कर्नाटक के गडक जिले के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले कन्नड़ परिवार में 4 फरवरी 1922 को हुआ था। उनके पिता गुरूराज जोशी एक स्कूल शिक्षक थे। 16 भाई बहनों में भीमसेन सबसे बड़े थे। जोशी की युवावस्था में उनकी मां का निधन हो गया था।
कम्र उम्र में ही जोशी की शादी सुनंदा काट्टी से हो गई थी। उनसे उनके चार बच्चे थे। पंडित जोशी ने बाद में वत्सला मुधोलकर से ब्याह रचाया। वत्सला से जोशी के दो पुत्र जयंत और श्रीनिवास व एक पुत्री शुभदा हैं। जोशी की पहली पत्नी सुनंदा की मृत्यु 1992 में हो गई जबकि वत्सला 2005 में स्वर्ग सिधार गई। जोशी का बड़ा पुत्र जयंत एक पेंटर है जबकि श्रीनिवास वोकलिस्ट और कंपोजर है।
जोशी को मिले पुरस्कार
1972 - पद्म श्री
1976 - संगीत नाटक अकादमी अवार्ड
1985 - पद्म भूषण
1985 - नेशनल फिल्म अवार्ड सर्वश्रेष्ठ गायक
1986 - फर्स्ट प्लेटिनम डिस्क
1999 - पद्म विभूषण
2000 - आदित्य विक्रम बिड़ला कलाशिखर पुरस्कार
2001 - कन्नड़ यूनिवर्सिटी से नाडोजा अवार्ड
2002 - महाराष्ट्र भूषण
2003- केरल सरकार की ओर से स्वाथी संगीत पुरस्कार
2005 - कर्नाटक रत्न
2008 - भारत रत्न
2008 - स्वामी हरिदास अवार्ड
2009- दिल्ली सरकार की ओर से लाइफटाइम अचरवमेंट अवार्ड
2010 - राम सेवा मंडली की ओर से एसवी नारायणस्वाती राव नेशनल अवार्ड
किराना घराने से था संबंध
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान स्तंभ भीमसेन जोशी किराना घराने के महत्वपूर्ण गायक थे। उन्होंने महज 19 साल की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था और लगभग सात दशकों तक शास्त्रीय गायन किया। पंडित जोशी 1943 में मुंबई आ गए थे और उन्होंने एक रेडियो आर्टिस्ट के रूप में काम किया। म्यूजिक कंपनी एचएमवी ने 22 वर्ष की उम्र में हिन्दी और कन्नड़ भाषा में उनका पहला एलबम रिलीज किया था।
खयाल शैली थी खास
जोशी को मुख्य रूप से खयाल शैली और भजन के लिए जाना जाता है। पंडित जोशी को वर्ष 1999 में पद्मविभूषण, 1985 में पद्मभूषण और 1972 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया था। जोशी का 1985 में आया मशहूर "मिले सुर मेरा तुम्हारा" गाना आज भी देशवासियों की जुबां पर है।
फिल्मों में भी किया गायन
जोशी ने कई बॉलीवुड फिल्मों के लिए भी गाने गाए। 1956 में आई बसंत बहार में उन्होंने मन्ना डे के साथ, 1973 में बीरबल माई ब्रदर में पंडित जसराज के साथ गायन किया। उन्होंने 1958 में आई फिल्म तानसेन और अनकही (1985) के लिए भी गाने गाए।
कर्नाटक में हुआ जन्म
पंडित जोशी का जन्म कर्नाटक के गडक जिले के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले कन्नड़ परिवार में 4 फरवरी 1922 को हुआ था।
उनके पिता गुरूराज जोशी एक स्कूल शिक्षक थे। 16 भाई बहनों में भीमसेन सबसे बड़े थे। जोशी की युवावस्था में उनकी मां का निधन हो गया था।
कम्र उम्र में ही जोशी की शादी सुनंदा काट्टी से हो गई थी। उनसे उनके चार बच्चे थे। पंडित जोशी ने बाद में वत्सला मुधोलकर से ब्याह रचाया। वत्सला से जोशी के दो पुत्र जयंत और श्रीनिवास व एक पुत्री शुभदा हैं। जोशी की पहली पत्नी सुनंदा की मृत्यु 1992 में हो गई जबकि वत्सला 2005 में स्वर्ग सिधार गई। जोशी का बड़ा पुत्र जयंत एक पेंटर है जबकि श्रीनिवास वोकलिस्ट और कंपोजर है।
संगीत जगत की हस्तियों ने दी भीमसेन को श्रद्धांजलि
प्रख्यात गायक पंडित भीमसेन जोशी के निधन से शोकग्रस्त भारतीय संगीत जगत ने सोमवार को उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक कोहिनूर करार दिया।पंडित जसराज ने कहा कि सुबह सुबह पंडित जी के निधन की खबर सुन कर वह स्तब्ध रह गए। उन्होंने कहा कि यह सूर्योदय के समय सूर्यास्त था। जसराज ने कहा कि वह किसी एक घराने से संबद्ध नहीं थे बल्कि पूरे हिंदुस्तानी संगीत की दुनिया से उनका जुड़ाव था। जोशी ने पिछले कई दशकों से संगीत प्रेमियों को दीवाना बना रखा था।पंडित सतीश व्यास ने जोशी को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का कोहिनूर करार दिया। उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत का मतलब एक वर्ग विशेष से होता है, लेकिन पंडित जी ने सभी अवरोध दूर करते हुए संगीत को आम आदमी से जोड़ा। संगीत के लिए उन्होंने महान योगदान दिया है।गायकों, सुरेश वाडकर और आरती अंकलीकर टिकेकर ने भी शास्त्रीय संगीत के इस शिखर पुरुष के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि दी और कहा कि उनके निधन से रिक्त हुए स्थान को भरना मुश्किल होगा।भजन और ग़ज़ल गायक अनूप जलोटा ने कहा कि एक सप्ताह पहले मैंने अपने पिता को खोया और अब पंडित जी नहीं रहे। भजन और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की इन दो प्रख्यात हस्तियों ने कई कार्यक्रम एक साथ पेश किए थे। ऐसा लगता है जैसे भारतीय संगीत अनाथ हो गया हो।शास्त्रीय गायिका बेगम परवीन सुल्ताना ने जोशी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह मेरे लिए बड़े भाई की तरह थे। वह ऐसी हस्ती थे जिन्होंने हमें महाराष्ट्र से परिचित कराया।गायक शौनक अभिषेकी ने कहा कि जोशी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के भीष्म पितामह थे। उन्होंने कहा कि वह इस क्षेत्र के अमिट हस्ताक्षर हैं और अपने समर्पण, लगन तथा संगीत के लिए प्रतिबद्धता की वजह से उन्होंने यह स्थान हासिल किया।
अभिषेकी ने कहा कि उनका जीवन मेरे जैसे नई पीढ़ी के संगीतकारों के लिए एक प्रेरणा है और उनके बताए रास्ते पर चलना ही उनके प्रति च्च्ची श्रद्धांजलि होगी।
गायक और संगीतकार शंकर महादेवन ने कहा कि पंडित जी के निधन के साथ ही भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक युग का अवसान हो गया। उन्होंने कहा कि माना जाता है कि शास्त्रीय संगीत आम लोगों को अपील नहीं करता लेकिन अपने संगीत की सवाचर््च्च क्षमता तथा अपने व्यक्तित्व की आभा से उन्होंने खुद को आम आदमी से जोड़ लिया था।महादेवन ने कहा कि जब दो दशक पहले मिले सुर मेरा तुम्हारा प्रसारित हुआ था तो आम आदमी सीधे पंडित जी से जुड़ गया था। यह उनकी ओजस्वी वाणी ही थी जिसने राष्ट्रीय एकता का दृढ़ संदेश दिया था।
बांसुरी वादक राकेश चौरसिया ने जोशी के निधन को देश के लिए बड़ी क्षति बताते हुए कहा कि वह अपने आप में एक संस्थान थे। शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल ने कहा कि वह एक किवदंती और संगीत के सभी विद्यार्थियों के लिए प्रेरक व्यक्तित्व थे।

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