Wednesday, June 29, 2011

सांसद श्रीप्रकाश जायसवाल से अवार्ड लेते हुए पत्रकार शुक्ल

चंडीदत्त शुक्ल राजीव गाँधी एक्सिलेंस

अवार्ड -2011 से सम्मानित

दैनिक भास्कर की मैगज़ीन डिवीज़न के फीचर एडिटर और चौराहा.इन के संपादक चण्डीदत्त शुक्ल को दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने राजीव गांधी एक्सिलेंस अवार्ड-2011से सम्मानित किया। इस अवसर पर सांसद अन्नू टंडन भी मौजूद रहीं। कार्यक्रम का आयोजन रामप्रकाश वर्मा के संपादन में प्रकाशित पत्रिका समाचार पत्र सीमापुरी टाइम्स की ओर से किया गया था।इस आयोजन में अलग-अलग क्षेत्रों की प्रतिभाओं को उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया गया। इनमें नई दुनिया मुंबई के स्थानीय संपादक पंकज शुक्ल, सारेगामा लिटिल चैंप के प्रतिभागी तन्मय, सूचना और तकनीक के माहिर पत्रकार बालेंदु दाधीचि, नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक पंकज चतुर्वेदी, टेलीविजन पत्रकार श्वेता रश्मि, हस्तक्षेप।कॉम के संपादक अमलेंदु उपाध्याय, जगदीश गांधी आदि शामिल हैं।

भड़ास 4 मिडिया से आभार सहित

Sunday, June 26, 2011

तेलंगाना क्षेत्र के कांग्रेस सांसद एक
जुलाई को अपनी रणनीति तैयार करेंगे

हैदराबाद। तेलंगाना समर्थकों द्वारा तेलंगाना के विचारक प्रोजयशंकर को श्रद्धांजलि देने वरंगल गये कांग्रेसी नेताआे पर हमलों को तेलंगाना की जनता की भावनाआे की अभिव्यक्ति करार देते हुए तेलंगाना कांग्रेस के सांसदों ने आज कहा कि वे एक जुलाई को एक अन्य बैठक के बाद अपनी भावी रणनीति तैयार करेंगे।
आज पेद्दापल्ली में अपने आवास पर सांसदों डॉमंदा जगन्नाथम, बलराम नायक, विवेक, नलगोंडा सांसद गुट्टा सुखेंदर रेड्डी के साथ एक बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए पेद्दापल्ली सांसद डॉजीविवेक ने नेताआे से अपील की कि वे पृथक तेलंगाना राज्य की प्राप्ति के लिए मजबूती से संघर्ष करें। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के कुछ नेताफूट डालो और शासन करोकी नीति अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि तेलंगाना आंदोलन कमजोर नहीं प़डेगा और यदि नेताआे ने तेलंगाना समर्थकों की आलोचना जारी रखी तो तेलंगाना के गठन की प्रक्रिया में और देरी होगी। यह उल्लेख करते हुए कि वे प्रदेश के विभाजन के मुद्दे पर सीमांध्र के नेताआे को विश्वास में ले रहे हैं, गुट्टा ने कहा कि हमले करना उचित नहीं था। उन्होंने कहा कि सीमांध्र के पांच सांसदों को छ़ोडकर अन्य सभी सांसद पृथक तेलंगाना के गठन का विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब समय गया है कि तेलंगाना सीमांध्र की जनता अलगअलग रहे क्योंकि अब उनके लिये साथसाथ रहना असंभव है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के वक्तव्य की याद दिलाते हुए कहा कि पंडित नेहरू ने कहा था कि जब तेलंगाना सीमांध्र की जनता साथसाथ रहने की स्थिति में रहे, तो वह अलगअलग हो सकती है।
श्री रेड्डी ने कहा कि वरंगल में दलित कांग्रेसी नेताआे पर हमला किया जाना, आंदोलन को कमजोर करने के लिये सीमांध्र के नेताआे की साजिश थी। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा नहीं लगता कि ये हमले किसी राजनीतिक षडयंत्र या भावना में बहकर किये गये थे। यह बताते हुए कि तेदेपा नेता, जो केंद्रीय गृह मंत्री पीचिदंबरम को तेलंगाना मुद्दे पर एक पत्र भी नहीं लिख सके, उन्हें पृथक तेलंगाना के लिये समयसीमा निर्धारित करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। विजयव़ाडा सांसद लग़डपाटी राजगोपाल की खिंचाई करते हुए, उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना रद्दी की टोकरी में डाल देने के काबिल है। उन्होंने कहा कि राजगोपाल का राजनैतिक जीवन केवल सात साल पुराना है तथा उनके वक्तव्य को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।

Tuesday, June 14, 2011


गंगापुत्र स्वामी निगमानंद
का गंगा के लिए बलिदान
हरिद्वार की गंगा में खनन रोकने के लिए कई बार के लंबे अनशनों और जहर दिए जाने की वजह से मातृसदन के संत निगमानंद अब नहीं रहे। हरिद्वार की पवित्र धरती का गंगापुत्र अनंत यात्रा पर निकल चुका है। वैसे तो भारतीय अध्यात्म परंपरा में संत और अनंत को एक समान ही माना जाता है। सच्चे अर्थों में गंगापुत्र वे थे।
गंगा रक्षा मंच, गंगा सेवा मिशन, गंगा बचाओ आंदोलन आदि-आदि नामों से आए दिन अपने वैभव का प्रदर्शन करने वाले मठों-महंतों को देखते रहे हैं पर गंगा के लिए निगमानंद का बलिदान इतिहास में एक अलग अध्याय लिख चुका है।

गंगा के लिए संत निगमानंद ने 2008 में 73 दिन का आमरण अनशन किया था। उसी समय से उनके शरीर के कई अंग कमजोर हो गए थे और न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर के भी लक्षण देखे गए थे। और अब 19 फरवरी 2011 से शुरू संत निगमानंद का आमरण अनशन 68वें दिन (27 अप्रैल 2011) को पुलिस गिरफ्तारी के साथ खत्म हुआ था, उत्तराखंड प्रशासन ने उनके जान-माल की रक्षा के लिए यह गिरफ्तारी की थी। संत निगमानंद को गिरफ्तार करके जिला चिकित्सालय हरिद्वार में भर्ती किया गया। हालांकि 68 दिन के लंबे अनशन की वजह से उन्हें आंखों से दिखाई और सुनाई पड़ना कम हो गया फिर भी वे जागृत और सचेत थे और चिकित्सा सुविधाओं की वजह से स्वास्थ्य धीरे-धीरे ठीक हो रहा था। लेकिन अचानक 2 मई 2011 को उनकी चेतना पूरी तरह से जाती रही और वे कोमा की स्थिति में चले गए। जिला चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक पीके भटनागर संत निगमानंद के कोमा अवस्था को गहरी नींद बताते रहे। बहुत जद्दोजहद और वरिष्ठ चिकित्सकों के कहने पर देहरादून स्थित दून अस्पताल में उन्हें भेजा गया। अब उनका इलाज जौली ग्रांट स्थित हिमालयन इंस्टिट्यूट हॉस्पिटल में चल रहा था। हिमालयन इंस्टिट्यूट हॉस्पिटल के चिकित्सकों को संत निगमानंद के बीमारी में कई असामान्य लक्षण नजर आए और उन्होंने नई दिल्ली स्थित ‘डॉ लाल पैथलैब’ से जांच कराई। चार मई को जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि ऑर्गोनोफास्फेट कीटनाशक उनके शरीर में उपस्थित है। इससे ऐसा लगता है कि संत निगमानंद को चिकित्सा के दौरान जहर देकर मारने की कोशिश की गई थी। जहर देकर मारने की इस घिनौनी कोशिश के बाद उनका कोमा टूटा ही नहीं। और 42 दिनों के लंबे जद्दोजहद के बाद वे अनंत यात्रा के राही हो गये। पर संत निगमानंद का बलिदान बेकार नहीं गया। मातृसदन ने अंततः लड़ाई जीती। हरिद्वार की गंगा में अवैध खनन के खिलाफ पिछले 12 सालों से चल रहा संघर्ष अपने मुकाम पर पहुँचा। 26 मई को नैनीताल उच्च न्यायालय के फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि क्रशर को वर्तमान स्थान पर बंद कर देने के सरकारी आदेश को बहाल किया जाता है।
मातृसदन के संतों ने पिछले 12 सालों में 11 बार हरिद्वार में खनन की प्रक्रिया बंद करने के लिए आमरण अनशन किए। अलग-अलग समय पर अलग-अलग संतों ने आमरण अनशन में भागीदारी की। यह अनशन कई बार तो 70 से भी ज्यादा दिन तक किया गया। इन लंबे अनशनों की वजह से कई संतों के स्वास्थ्य पर स्थाई प्रभाव पड़ा।
मातृसदन ने जब 1997 में स्टोन क्रेशरों के खिलाफ लड़ाई का बिगुल फूंका था। तब हरिद्वार के चारों तरफ स्टोन क्रेशरों की भरमार थी। दिन रात गंगा की छाती को खोदकर निकाले गए पत्थरों को चूरा बनाने का व्यापार काफी लाभकारी था। स्टोन क्रेशर के मालिकों के कमरे नोटों की गडिडयों से भर हुए थे और सारा आकाश पत्थरों की धूल (सिलिका) से भरा होता था। लालच के साथ स्टोन क्रेशरों की भूख भी बढ़ने लगी तो गंगा में जेसीबी मशीन भी उतर गयीं। बीस-बीस फुट गहरे गड्ढे खोद दिए। जब आश्रम को संतों ने स्टोन क्रेशर मालिकों से बात करने की कोशिश की तो वे संतों को डराने और आतंकित करने पर ऊतारू हो गये। तभी संतों ने तय किया कि गंगा के लिए कुछ करना है। और तब से उनकी लड़ाई खनन माफियाओं के खिलाफ चल रही थी।
(इण्डिया वाटर पोर्टल से आभार सहित )

Thursday, June 9, 2011

जोड़ी आज के जय एवम वीरू की

रमेश सिप्पी की फिल्म "शोले "का एक गाना काफी लोकप्रिय हुआ था.जिसके बोल थे.
"ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर ,तेरा साथ, ना छोड़ेंगे"
उक्त गाने की पंक्तियां श्री अन्ना हजारे एवम बाबा रामदेव के इस काल्पनिक चित्र पर सटीक बैठ रही है
जिसे "आप की न्यूज -आप की खबर "के लिए एक सुधि पाठक ने भेजा है|

नहीं रहे चित्रकार एम.ऍफ़ हुसैन

लन्दन|भारत के मशहूर पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन का निधन हो गया है. गुरुवार तड़के लंदन के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया.अपनी कई पेंटिंग्स के कारण विवादों में रहे एमएफ़ हुसैन 95 वर्ष के थे.मक़बूल फ़िदा हुसैन का जन्म महाराष्ट्र के पंढ़रपुर में 17 सितंबर 1915 को हुआ था.वर्ष 2006 से ही वे भारत से चले गए थे. हिंदू देवी-देवताओं की विवादित पेंटिग्स के कारण हिंदू संगठनों ने उन्हें धमकी दी थी
.विवाद

फ़ोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत का पिकासो की पदवी दी थी. वर्ष 1996 में हिंदू देवी-देवताओं की नग्न पेंटिग्स को लेकर काफ़ी विवाद हुआ.कई कट्टरपंथी संगठनों ने तोड़-फोड़ की और एमएफ़ हुसैन को

धमकी भी मिली. पिछले साल जनवरी में उन्हें क़तर ने नागरिकता देने की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था.हिंदी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के बड़े प्रशंसक एमएफ़ हुसैन ने उन्हें लेकर गज गामिनी नाम की फ़िल्म भी बनाई थी.इसके अलावा उन्होंने तब्बू के साथ एक फ़िल्म मीनाक्षी: अ टेल ऑफ़ थ्री सिटीज़ बनाई थी. इस फ़िल्म के एक गाने को लेकर काफ़ी विवाद हुआ था. कुछ मुस्लिम संगठनों ने इस फ़िल्म पर आपत्ति जताई थी.

करियर

एमएफ़ हुसैन को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1940 के दशक के आख़िर में मिली. वर्ष 1947 में वे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप में शामिल हुए.युवा पेंटर के रूप में एमएफ़ हुसैन बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे. वर्ष 1952 में उनकी पेंटिग्स की प्रदर्शनी ज़्यूरिख में लगी.उसके बाद तो यूरोप और अमरीका में उनकी पेंटिग्स की ज़ोर-शोर से चर्चा शुरू हो गई. वर्ष 1955 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया.वर्ष 1967 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म थ्रू द आइज़ ऑफ़ अ पेंटर बनाई. ये फ़िल्म बर्लिन फ़िल्म समारोह में दिखाई गई और फ़िल्म ने गोल्डन बेयर पुरस्कार जीता.वर्ष 1971 में साओ पावलो समारोह में उन्हें पाबलो पिका

सो के साथ विशेष निमंत्रण देकर बुलाया गया था. 1973 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया तो वर्ष 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया.भारत सरकार ने वर्ष 1991 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. 92 वर्ष की उम्र में उन्हें केरल सरकार ने राजा रवि वर्मा पुरस्कार दिया.क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी. इसके साथ ही वे भारत के सबसे महंगे पेंटर बन गए थे. उनकी आत्मकथा पर एक फ़िल्म भी बन रही है.

हुसैन भारत लौटना चाहते थे

मशहूर पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन का कहना था कि वे 'निर्वासन में क़तई नहीं' हैं.

और भारत लौटना चाहते हैं .यह इच्छा उनहोने बी.बी.सी रेडियो के साथ एक भेंटवार्ता मैं कही थी.उस विशेष बातचीत में कहा कि "मैं निर्वासन में नहीं हूँ, मैं अपने प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए भारत से निकला हूँ क्योंकि मुझे लगा कि वे वहाँ पूरे नहीं हो सकते."उन्होंने कहा, "देखिए, जब मैं भारत से निकला था 2005 में तब कोई समस्या नहीं थी. मुझे तीन बड़े प्रोजेक्ट करने थे जिसके लिए स्पॉन्सर चाहिए थे जो भारत में नहीं मिल सकते थे इसलिए मैं पहले दुबई और फिर क़तर गया."लंदन के पॉश इलाक़े मेफ़ेयर के एक अपार्टमेंट में बड़े बड़े कैनवसों पर महाभारत सीरिज़ की विशाल पेंटिग्स बना रहे एमएफ़ हुसैन कहते हैं, "वैसे भी भारत में कोई कभी मेरा कोई स्टूडियो या एक ठिकाना नहीं रहा, मैं घूम घूम कर पेंटिंग्स करता रहा हूँ, अक्सर भारत से बाहर रहा हूँ."लाठी जितनी बड़ी कूची को हवा में लहराकर हुसैन कहते हैं, "जितना प्यार मुझे भारत में मिला, भारत का बच्चा-बच्चा मुझे जानता है, उतना प्यार मुझे दुनिया में किसी ने नहीं दिया, मैं शरीर से भारत से दूर हूँ लेकिन उससे क्या होता है, मेरा दिल-दिमाग़ सब भारत में है."हिंदू देवियों के नग्न चित्र बनाने के मुद्दे पर शुरू हुए हंगामे के बाद एमएफ़ हुसैन ने इसी वर्ष फ़रवरी महीने में क़तर की नागरिकता ले ली जिसकी मीडिया में बहुत चर्चा हुई थी.रंगों और ब्रशों से घिरे अपने मूढ़े पर बैठे हुसैन भावुक होकर कहते हैं, "भारत की संस्कृति और उसकी तमाम बातें मेरे भीतर पूरी तरह भरी हुई हैं, मैं 90 साल तक वहाँ रहा हूँ, अगर आप मुझे एक हज़ार साल तक किसी जंगल में भी छोड़ दें तो वो बातें मेरे भीतर से ख़त्म होने वाली नहीं हैं."ये पूछे जाने पर क्या उनका भारत जाने का इरादा है तो उन्होंने कहा, "ये तो पोलिटिकल झमेला है, आज नहीं तो कल ख़त्म हो जाएगा. फ़िलहाल तो मुझे इंडियन सिविलाइज़ेशन और अरब सिविलाइज़ेशन के दो बड़े पेंटिंग प्रोजेक्ट करने हैं उसमें दो साल लगेंगे. मैंने सोचा कि ये प्रोजेक्ट किसी अरब देश में रहकर पूरा किया जाए. उसके बाद ज़रूर जाऊँगा."

'मैं भागा नहीं हूँ'

हुसैन ने बताया कि उन्होंने विदेश में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए दी जाने वाली 'नागरिकता' ले ली है. उन्होंने कहा, "मैं जब चाहे भारत जा सकता हूँ, मुझे वीज़ा या पासपोर्ट की ज़रूरत नहीं है, मैं ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ़ इंडिया हूँ."उन्होंने भारत की नागरिकता छोड़कर क़तर की नागरिकता लेने का फ़ैसला क्यों किया, इसका जवाब देने के बदले एमएफ़ हुसैन कहते हैं, "जिसे जो कहना है, कहता रहे, मेरे ऊपर कोई प्रतिबंध तो है नहीं, जब मेरा जी करेगा भारत जाऊँगा."मीडिया के रवैए की शिकायत करते हुए वे कहते हैं, "मीडिया कभी ये नहीं लिखता कि मेरे ऊपर 900 से ज़्यादा मुक़दमे लाद रखे हैं, पिछले 12 साल से मैं अपने वकीलों को 60-70 हज़ार रुपए हर महीने देता हूँ."वे कहते हैं, "मैं क़ानून से भागा नहीं हूँ, वह प्रक्रिया चल रही है, कोर्ट के सम्मन आते हैं मेरे वकील जवाब देते हैं. होम मिनिस्ट्री की एक इनक्वायरी अब भी चल रही है, मुझे समझ में नहीं आता कि ये क्या हिमाक़त है."इसका मतलब निकाला जा सकता है कि भारत के सेक्युलर डेमोक्रेटिक न्याय व्यवस्था में उनका यक़ीन नहीं है, इस पर हुसैन ने कहा, "ऐसा बिल्कुल नहीं है, अगर ऐसा होता तो मैं ओवरसीज़ इंडियन सिटिज़नशिप क्यों लेता?"एमएफ़ हुसैन ने बताया कि वे जल्दी ही एक फ़िल्म भी बनाने वाले हैं जिसमें विद्या बालन होरीइन होंगी.उन्होंने बताया, "अगले साल फ़रवरी-मार्च से इस फ़िल्म की शूटिंग शुरू हो जाएगी, अभी मैं स्क्रिप्ट लिख रहा हूँ."अगर एमएफ़ हुसैन अपनी अगली फ़िल्म बनाते हैं तो वे संभवतः सिनेमा के इतिहास में सबसे उम्रदराज़ निर्माता-निर्देशक होंगे.

बी .बी.सी.रेडियो से आभार सहित