Sunday, July 17, 2011

कहानी मंदिर के संपत्ति की

नही रहे भगवान का खजाना
बचाने वाले भक्त टी.पी सुंदरराजन

निज़ामाबाद | तिरूअनंतपुरम से खबर है की पदनाभास्वामी मंदिर के सबसे अहम् व्यक्ति टी.पी.सुन्दरम की आज (रविवार 17 जुलाई ) सुबह संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया,वे सत्तर वर्ष के थे|सुंदरराजन विगत दो दिनों से बुखार से पीडित थे। आज सुबह उनकी अचानक तबियत बिगडी और उनकी मौत हो गई।श्री टीपी सुंदरराजन ने ही मंदिर में दबे खजाने की जांच की मांग की थी |बताया जाता है कि उन्हें दो दिन से बुखार था औररविवार सुबह उनकी मौत हो गई। वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनी सात सदस्यीय कमेटी के भी सदस्य थे। सुंदरराजन 1964 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की सुरक्षा में लगे स्टाफ में भी काम किया था। लेकिन बाद में उन्होंने नौकरी छोड दी थी और वे वकालत करने लगे थे। वे मंदिर परिसर में ही रहते थे, लेकिन कुछ दिनों पूर्व मंदिर प्रबंधन ने उन्हें परिसर से बाहर निकालने का आदेश दिया था |

सत्तर साल के बुजुर्ग, पूर्व आइपीएस अधिकारी टी.पी. सुंदरराजन ने दो साल पहले अकल्पनीय काम किया. वे श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर से बमुश्किल 100 फुट की दूरी पर एक सादगीभरी ब्राह्मण बस्ती में रहते हैं.उन्होंने एक याचिका दाखिल की जिसकी बदौलत मंदिर के तहखानों को नाटकीय ढंग से खोलने का आदेश मिला और फिर इतना खजाना मिला जिसके बारे में कुछ लोगों का आकलन है कि वह 1 लाख करोड़ रु. से अधिक का है (केरल के पूर्व मुख्य सचिव सी.पी. नायर के मुताबिक, मंदिर के खजाने का बाजार भाव पांच लाख करोड़ रु. से अधिक हो सकता है.) इसने केरल के सबसे बड़े मंदिर को शायद दुनिया की सबसे धनी धार्मिक स्थान बना दिया है.इसने उस राज्‍य को चकित कर दिया है जो भारत के 936 टन वार्षिक सोना उपभोग का करीब 20 फीसदी इस्तेमाल करता है. और इसने खजाने के स्वामित्व पर पेचीदा सवाल खड़े कर दिए हैं.सुंदरराजन सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित उस सात सदस्यीय समिति के सदस्य थे जो गर्भ गृह के इर्दगिर्द के छह तहखानों में गई और वहां का मुआयना किया. उनकी सफेद दाढ़ी उनके खुले सीने पर लहराती रहती थी और कभी-कभी वे ऑक्सीजन मास्क लगाए रहते थे |समिति के अन्य सदस्यों के साथ वे दो तहखानों में गए. मंदिर के भूरे ग्रेनाइट फर्श के पांच फुट नीचे चार सीढ़ियां उतरने पर उन तहखानों में हजारों फ्रांसीसी और डच सोने के सिक्कों, हीरे और सोने की मूर्तियों और हीरा जड़ित जेवर समेत 1 टन सोना मिला.मंदिर अधिकारियों ने उस खजाने की कीमत 1 लाख करोड़ रु. आंकी है, लेकिन इसमें उसके सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुराने होने के मूल्य को शामिल नहीं किया गया है. फ्रांसीसी औपनिवेशिक काल के 5 ग्राम के एक असली सोने के सिक्के, 'नैपोलियन' का मौजूदा बाजार भाव 10,000 रु. से थोड़ा अधिक होगा. लेकिन संग्रहकर्ता इसके लिए 1 लाख रु. चुका सकते हैं.इस बीच सुंदरराजन ने इससे भी बड़े खजाने की ओर संकेत किया था जो जमीन के नीचे स्थित एक तहखाना, जहां माना जाता है कि त्रावणकोर के शासक मलयालम कैलेंडर के आखिरी महीने करकिडिकम के दौरान मंदिर के अंदरूनी हिस्से में तांबे के बर्तनों में सोने के सिक्के रखते थे. वे कहते थे कि , ''यह प्रथा सदियों तक चली लेकिन उस तहखाने के रास्ते के निशान मिट गए हैं.''पश्चिम बंगाल काडर के 1964 के अधिकारी सुंदरराजन ने खुफिया ब्यूरो में सहायक निदेशक के रूप में काम किया और वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भी करीबी सहयोगी थे. उन्होंने छह साल बाद आइपीएस से इस्तीफा दे दिया| इस संदर्भ मैं उनका कहना था कि ''मैं अंदरूनी राजनीति नहीं झेल सका''-और सुप्रीम कोर्ट में वकालत शुरू कर दी. लेकिन '80 के दशक में अपने पैतृक इलाके तिरुअनंतपुरम में ''अपने पिता को प्रतिदिन पद्मनाभस्वामी मंदिर ले जाने की खातिर'' लौटने से पहले वकालत छोड़ दी.लेकिन आखिर उस ब्रह्मचारी और विष्णु के भक्त, जो दशकों से दिन में तीन बार मंदिर में प्रार्थना करता था,को न्यायिक हस्तक्षेप कराने के लिए क्यों बाध्य हुआ? सुंदरराजन का कहना था कि इसकी शुरुआत 1997 में उस समय हुई जब उन्होंने तत्कालीन त्रावणकोर राज परिवार के प्रमुख 89 वर्षीय उतरदम तिरुनल मार्तंड वर्मा का एक संदेश देखा. उस संदेश में उन्होंने इस प्रसिद्ध खजाने का मुआयना करने की इच्छा जाहिर की थी.इस पर सुंदरराजन का कहना था कि , ''मुझे डर लगा कि खजाने को पार किया जा

कता है.'' उन्होंने 'क्वो वारंटो' हासिल कर लिया या दूसरे शब्दों में हाइकोर्ट से मंदिर पर तिरुनल के अधिकार को चुनौती दिलवा ई. इसकी वजह से तत्कालीन राज परिवार और उसके मुखिया के साथ उनका कई बार टकराव हुआ.सुंदरराजन मंदिर का प्रशासनिक कार्य देखने वाले त्रावणकोर के शाही परिवार, खासकर उसके अंतिम महाराजा श्रीचित्र तिरुनल बलराम वर्मा, जिनका 1991 में देहांत हो गया, के काफी करीब थे. श्रीचित्र की जगह उनके छोटे भाई उतरदम तिरुनल ने ली जो अब शहर के पट्टोम पैलेस में रहते हैं. सुंदरराजन के अनुसार , ''राज परिवार के कुछ सदस्यों ने दावा किया कि वे मंदिर और उसके खजाने के मालि क हैं. इसी दावे की वजह से मुझे यह मिशन बनाना पड़ा.''तब उनहोने 2009 में राज्‍य हाइकोर्ट में याचिका दाखिल करके मंदिर का प्रशासन सरकार के हवाले करने को कहा. इस पूर्व पुलिस अधिकारी ने खजाने का मुआयना करने के बाद आरोप लगाया कि उसमें से कुछ हिस्सा निकाल लिया गया होगा.उनका कहना था कि , ''खजाना काफी हद तक सही-सलामत लगता है. पेंटिंग के लिए रखा गया करीब 2.7 टन सोने का डस्ट (या धूल) गायब हो गया है. शायद मंदिर को सील कराने से पहले ही उसे चुरा लिया गया होगा.'' इस आरोप की पुष्टि करना महज इसलिए मुश्किल है क्योंकि उस सोने का हिसाब बहीखाते में नहीं लिखा गया था.

कहानी मंदिर के संपत्ति की

मंदिर के रिकॉर्ड के मुताबिक, इसका निर्माण 10वीं सदी में अए वंश ने कराया था, जो त्रावणकोर राज परिवार से पहले यहां राज करता था. राजमहल के दस्तावेजों

में 15वीं सदी के दौरान भी मंदिर में रखे भगवान के स्वर्ण आभूषणों का जिक्र है. लेकिन इतना धन कहां से आया?अधिकतर सिद्धांत त्रावणकोर राजवंश के संस्थापक और दक्षिण केरल को एकजुट करने वाले योद्धा राजकुमार मार्तंड वर्मा को इसका श्रेय देते हैं. वर्मा ने एक के बाद एक अभियानों में स्थानीय राजाओं को अपने अधीन कर लिया. उन्होंने एक डच समुद्री बेड़े के हमले को भी नाकाम करके उसके बेलजियम के निवासी कमांडर यूस्टेकियस डी'लिनॉय को गिरफ्तार कर लिया.सबसे बढ़कर उन्होंने महत्वपूर्ण कालीमिर्च के व्यापार पर पर कब्जा कर लिया, जिसकी वजह से यूरोपीय लोग केरल आते थे. 1750 तक वणकोर राज कोच्चि से कन्याकुमारी तक फैल गया.ऐसा लगता है कि सोने की कभी कमी नहीं रही. कोलंबिया के मिथकीय 'अल डोराडो' (संपन्नता और अवसरों का स्थान) की याद दिलाने वाले एक वार्षिक समारोह में मार्तंड वर्मा ने सोने के एक बर्तन में स्नान किया और उसे तोड़कर ब्राह्मणों में बांट दिया.इसके अलावा, उन्होंने अपने वजन के बराबर सोना दान किया. इसके बाद उन्होंने मंदिर का उसके मौजूदास्वरूप में पुनर्निर्माण किया. उन्होंने 1750 में एक भव्य समारोह में अपना राज भगवान, पद्मनाभस्वामी को समर्पित कर दिया, जो उसके बाद से 'त्रावणकोर के शासक' के बतौर जाने जाने लगे.वर्मा और उनके शासक भगवान के दास या ''पद्मनाभदासों'' के रूप में शासन करने लगे. यह अपने प्रतिद्वंद्वियों को चकमा देने और अपने शासन को दैविक स्वीकृति दिलाने की रणनीतिक चाल भी थी. मंदिर और उसके भगवान, काले रंग के शालिग्राम पत्थर से बनी विष्णु की मूर्ति जो 100 फनों वाले नाग पर विश्राम की मुद्रा में आरूढ़ हैं, राजवंश से पूरी तरह जुड़ गए.वर्षों तक राजाओं और भक्तों के चढ़ावे, कर और उपहार मंदिर के खजाने में जमा होते रहे. यह मंदिर ऐसे इलाके में स्थित है जहां कोई हमला नहीं हुआ. सिर्फ एक बार मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने हमला किया था लेकिन त्रावणकोर की अग्रिम पंक्ति के रक्षक

दलों ने 1790 में कोच्चि के पास उसे परास्त कर दिया. यह साम्राज्‍य 1947 में भारतीय संघ में शामिल हो गया हालांकि उसके दीवान, सर सी.पी. रामस्वामी अय्यर ने कुछ समय तक आजादी हासिल करने की कोशिश की थी.त्रावणकोर धार्मिक संस्थान कानून 1951 के तहत तत्कालीन रियासत के शासक को मंदिर के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप दी गई. यह विशेषाधिकार 1971 में पूर्व रियासतदारों के निजी खर्च भत्ते (प्रिवी पर्स) को खत्म किए जाने तक हासिल था. त्रावणकोर राज परिवार काफी अमीर है और अपनी जायदाद के किराये एवं निवेशों से अपना खर्च चला रहा है. लेकिन मंदिर के साथ उनके सहजीवी संबंध के दिन अब गिनेचुने हो सकते हैं.इस साल 31 जनवरी को न्यायमूर्ति के. सुरेंद्र मोहन और न्यायमूर्ति सी.एन. रामचंद्रन नायर की सदस्यता वाली हाइकोर्ट की पीठ ने सुंदरराजन की याचिका को मंजूरी दे दी. पीठ ने राज्‍य सरकार को तीन महीने के भीतर मंदिर प्रबंधन और संपत्तियों को अपने हाथ में लेने के लिए एक प्राधिकरण के गठन का आदेश दिया. पीठ ने कहा कि त्रावणकोर शाही परिवार मंदिर और उसकी संपत्तियों पर अपना दावा नहीं ठोक सकता. अदालत ने उतरदम तिरुनल की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि 1991 में उनके भाई की मौत के बाद उस मंदिर पर केवल राज्‍य सरकार का स्वामित्व हो सकता है.

तिरुनल ने इस आदेश को चुनौती दी. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी विशेष अवकाश याचिका के आधार पर हाइकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी. लेकिन न्यायमूर्ति आर.वी. रवींद्रन और न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक की सदस्यता वाली पीठ ने तहखानों को खोलने और संपत्ति का विस्तृत ब्यौरा बनाने का आदेश दे दिया. तहखानों को खोलने और उसकी निगरानी के लिए सात सदस्यीय समिति बना दी गई, जिसमें हाइकोर्ट के दो पूर्व न्यायाधीश और राज्‍य सरकार का एक वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं. संपत्ति के ब्यौरे को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जाना है. इस मामले की सुनवाई अगस्त में होने वाली है.सुंदरराजन शिवसेना जैसे हिंदू समूहों के लिए घृणा के पात्र बन गए हैं. वे उन्हें मंदिर पर राज्‍य के कब्जे की इजाजत देने का दोषी मानते हैं. उन्हें चौबीसों घंटे पुलिस संरक्षण दिया जा रहा है और दूसरी ओर लोग उनकी मंशा पर सवाल उठाने लगे हैं. पूर्व डीजीपी पी.आर. चंद्रन का कहना है, ''सुंदरराजन की निजी ईमानदारी और भगवान पद्मनाभस्वामी के प्रति भक्ति निष्पाप है. यह अफसोस की बात है कि उनके मौजूदा मिशन के पीछे निजी हित बताया जा रहा है.''इस बीच, संरक्षण विशेषज्ञों ने खजाने को केरल के उष्णकटिबंधी जलवायु और अधिक आर्द्रता वाले क्षेत्र से किसी सुरक्षित माहौल में रखने के लिए कहा है. पेरिस स्थित इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्युजियम के भारतीय खंड के महासचिव एम.वी. नायर का कहना है, ''सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खजाना तेजी से पुराना पड़ सकता है. हमें फौरन संरक्षण की पहल करनी चाहिए.''अभी तक छह तहखानों में से आखिरी नहीं खुला है लेकिन सार्वजनिक बहस छिड़ गई है कि मंदिर की संपत्ति का क्या किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वी.आर. कृष्ण अय्यर चाहते हैं कि खजाने को बेचकर उसका पैसा सामाजिक कार्यों में लगा दिया जाए. जाने-माने इतिहासकार के.एन. पणिक्कर का कहना है, ''इस खजाने को रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर का संग्रहालय बनाने का यह शानदार अवसर है. दुनियाभर के लोग इसे देखेंगे.''

विद्वानों का कहना है कि इसे मंदिर के निकट एक संग्रहालय में रखना चाहिए ताकि आम लोग और विद्वान अध्ययन के लिए उसे देख सकें. काहिरा स्थित मिस्त्री संग्रहालय इसी तरह का है. एका कल्चरल रिसोर्सेज के प्रबंध निदेशक प्रमोद कुमार के.जी. का कहना है, ''मंदिर का खजाना इलाके की भौतिक संस्कृति का ठोस सबूत है और बाहरी दुनिया के साथ इस इलाके के समृद्ध व्यापार और वाणिद्गियक संबंधों का अनुमान लगाने के लिए इसकी सभी पहलुओं से जांच की जानी चाहिए.यह भारत का संभवतः इकलौता ऐसा भंडार है जिसे चुराया नहीं गया और इसकी वजह से हमें अनुसंधान एवं अध्ययन का बड़ा अवसर मिला है.''लेकिन मंदिर से निकले खजाने के स्वामित्व पर सार्वजनिक बहस और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक संपत्ति का ब्यौरा तैयार होने तक इंतजार करना होगा. हालांकि न तो उतरदम तिरुनल, न ही राज परिवार के किसी सदस्य ने इन घटनाओं पर कोई टिप्पणी की है लेकिन उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि वे इससे कतई खुश नहीं हैं.

वैसे, वे संपत्ति का ब्यौरा तैयार किए जाने के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उन्हें अंदेशा है कि खजाने के ब्यौरे और उसकी जगह के बारे में सार्वजनिक रूप से बातचीत होने से मंदिर की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है. इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुए तिरुनल ने अपनी प्रतिक्रिया में रुआंसा मुंह बना लिया.मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने कहा है कि खजाना मंदिर के भीतर ही रहना चाहिए और राज्‍य सरकार सुरक्षा प्रदान कराएगी. कानून विशेषज्ञों का मानना है कि 1878 का ट्रेजर ट्रोव (खजाने का भंडार) कानून, जिसके मुताबिक जमीन के भीतर मिलने वाला सभी खजाना राज्‍य का होता है, इस मामले में लागू नहीं होता.हाइकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और सात सदस्यीय समिति के पर्यवेक्षक सी.एस. राजन का कहना है, ''मंदिर और उसके भगवान की इस संपत्ति पर न तो सरकार, न ही राजा दावा ठोक सकते हैं. यह कोई खजाना नहीं है बल्कि ऐसी संपत्ति है जिस पर मंदिर का अधिकार है और इसे साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज भी हैं.''हिंदू संगठनों की एक राय है कि वह खजाना मंदिर का है और उसे मंदिर परिसर से बाहर नहीं निकाला जाना चाहिए. उन्होंने इसे निजाम के जेवरों की तरह दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रालय में भेजे जाने के सुझाव का विरोध किया है. ऐसे में लगता है कि देवभूमि की संपत्ति उसके अपने ही इलाके में रहेगी.

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