Friday, October 28, 2011


श्री लाल शुक्ल नहीं रहे

लखनऊ: ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल का शुक्रवार को सुबह एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे।उनकी पत्नी का निधन कुछ वर्ष पहले हो चुका था।

31 दिसंबर 1925 को जन्मे शुक्ल को हाल ही में प्रख्यात कलाकार अमरकांत के साथ ग्यानपीठ पुरस्कार के लिए चुना गया था।

शुक्ल के निधन पर हिन्दी साहित्य में शोक की लहर दौड़ गई है। भारतीय ज्ञानपीठ,जनवादी लेखक संघ प्रगतिशील लेखक संघ समेत कई साहित्यिक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।

साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को संयुक्त रूप से वर्ष 2009 के लिए 45वें ज्ञानपीठ पुरस्कार के लिए चुना गया था। अस्वास्थ्य होने के कारण उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने उन्हें अस्पताल में जाकर अवार्ड प्रदान किया था।

2008 में उन्हें पदमभूषण सम्मान से नवाजा गया था। श्रीलाल शुक्ल कोराग दरबारी’, ‘मकान’, ‘सूनी घाटी का सूरज’, ‘पहला पड़ाव’, ‘अज्ञातवासतथाविश्रामपुर का संतआदि कालजयी रचनाओं केमाध्यम से साहित्य जगत में अपनी एक अलहदा एवं प्रतिष्ठित पहचान बनाई है।

संक्षिप्त जीवन परिचय

हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश में सन् 1925 में हुआ था। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' (1957) तथा पहला प्रकाशित व्यंग 'अंगद का पांव' (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास 'राग दरबारी' (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 मे पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।

उपन्यास : सूनी घाटी का सूरज · अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं। कहानी संग्रह: यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में। व्यंग्य संग्रह: अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर। आलोचना: अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग।


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