Wednesday, December 7, 2011

नांदेड़ में कांग्रेस ने किया महानालायकी

महाराष्ट्र में जारी नगरपालिका चुनावों के दौरान एक बार फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में फर्जीवाड़े के माध्यम से चुनाव जीतने के प्रयास का भंडाफोड हुआ है। संयोग से इस फर्जीवाड़े में उन अशोक चव्हाण की भूमिका शामिल पाई गई है जिनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 2009 में महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों का सामना किया था। अशोक चव्हाण का गृह जिला है नांदेड़।

नांदेड की अर्द्धापुर तालुका में नगरपालिका चुनावों के मतदान के लिए ईवीएम मशीनों का सर्वदलीय उम्मीदवारों के समक्ष प्रात्यक्षिक (डिमांस्ट्रेशन) किया जाना था। ईवीएम मशीन के वोट के बटन को निर्वाचन अधिकारियों ने सबके समक्ष 7 बार दबाया। बटन दबाने के बाद जब परिणाम देखा गया तो पाया गया कि वोट का बटन चाहे जिस उम्मीदवार के समक्ष दबाया जाए वोट सिर्फ कांग्रेस के खाते में जमा हो
रहा था। निर्वाचन अधिकारियों ने सबके समा कांग्रेस को वोट देने के लिए सिर्फ दो बार वोट का बटन दबाया, कांग्रेस को केवल 2 वोट मिलने चाहिए थे, पर कांग्रेस के खाते में 5 वोट गिरे। शिवसेना को वोट देने वाली बटन दबाती तो थी पर उसे वोट नहीं कर रही थी। पाया गया कि वोट शिवसेना को दिए जाने पर भी वह वोट कांग्रेस को मिल रहा था।

यह सब अशोक चव्हाण का ‘चमत्कार’
इस रहस्योद्घाटन के बाद कांग्रेस की साझीदार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी समेत सभी गैर कांग्रेस दलों ने नगरपालिका चुनावों में ईवीएम की बजाय मतपत्र के माध्यम से मतदान कराने की मांग निर्वाचन आयोग से की है। इस मांग के पक्ष में पूर्व केंद्रीय मंत्री और राकांपा की वरिष्ठ नेता सूर्यकांता पाटील ने तो अशोक चव्हाण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बीते विधानसभा चुनावों में ईवीएम
के फर्जीवाड़े के माध्यम से अशोक चव्हाण पर चुनाव जीतने का आरोप लगा था। अशोक चव्हाण नांदेड़ की भोकर सीट से विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव के समय उनकी हालत पतली थी क्योंकि शरद पवार के समर्थक डॉ. माधव किहालकर उनके खिलाफ चुनाव मैदान में थे। भोकर पहले मुदखेड़ विधानसभा सीट हुआ करती थी। अशोक चव्हाण चुनाव के समय ‘मनी, मदिरा और मसल पॉवर’ का खुलकर दुरुपयोग कर चुनाव जीतने में 2004 में
कामयाब हुए थे। तबसे मराठवाड़ा में इस तरह के चुनाव अभियान को ‘मुदखेड़ पैटर्न’ कहा जाता है। 2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अशोक चव्हाण ने मुदखेड़ पैटर्न का महाराष्ट्र व्यापी विस्तार किया। पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने महाराष्ट्र में पन्ने-पन्ने भर की सामग्री चुनाव के दौरान अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए सभी प्रमुख समाचारपत्रों में प्रकाशित करवाई। ‘पेड न्यूज’ के
फॉर्मूले से ‘अशोक पर्व’ महाराष्ट्र के अधिकांश अखबारों में प्रचारित किया गया। ‘अशोक पर्व’ की तर्ज पर मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह ने भी ‘कृपा पर्व’ का ‘पेड’ अभियान चलवाया। इस मामले में अशोक चव्हाण के खिलाफ मामला न्याय प्रविष्ट है। ‘अशोक पर्व’ के तहत भोकर विधानसभा में भी पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद अशोक चव्हाण अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं हो सके तो
उन्होंने ईवीएम फर्जीवाड़े की योजना बनाई।

चव्हाण के चेले का कमाल
भोकर चुनाव में चव्हाण के प्रतिद्वंद्वी रहे डॉ. माधव किन्हालकर ने इस मुद्दे पर न्यायालय में मामला दायर कर सप्रमाण आरोप लगाए हैं। विधानसभा चुनावों के दौरान फर्जीवाड़ा करने का जिम्मा चव्हाण ने जिस अफसर निशिकांत देशपांडे पर सौंपा था उसे वे नगरपालिका चुनाव के दौरान भी चुनाव प्रभारी बनवाने में कामयाब रहे। अर्द्धापुर में सर्वदलीय बैठक के सामने चुनावी फर्जीवाड़े का जो
भंडाफोड़ हुआ है उसमें भी उसी अधिकारी का कारनामा सबके सामने आया है। परिस्थितिजन्य प्रमाण स्पष्ट तौर पर साबित कर रहे हैं कि चव्हाण ईवीएम मशीनों के माध्यम से चुनावी गड़बडझाला करने के उस्ताद हैं।

‘सामना’ ने किया था सत्य उजागर
ईवीएम के माध्यम से चुनावी गड़बड़झाले की आशंका हमने इसी स्तंभ में सबसे पहले मई 2009 में व्यक्त की थी। कालांतर में तमाम राजनीतिक दलों ने भी ईवीएम के गडबड़झाले पर संदेह व्यक्त किया। शिवसेना प्रमुख अपने साक्षात्कार में कांग्रेस की चुनावी जीत को ईवीएम का चमत्कार करार दे चुके हैं। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी निर्वाचन आयोग से ईवीएम गड़बड़झाले पर लिखित
शिकायत कर चुके हैं। लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री कुमार जयललिता ने भी ईवीएम की प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त किया था। असम गण परिषद निर्वाचन आयोग से ईवीएम के खिलाफ गुहार लगा चुकी है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी एकाधिक बार ईवीएम के फर्जीवाड़े के खिलाफ आवाज बुलंद की है। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव कई मंचों से ईवीएम
विरोधी बयान जारी कर चुके हैं। जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कांग्रेस की सत्ता में साझीदार राकांपा के नेता खुद ईवीएम की बेईमानी के सामने खुद को मजबूर महसूस करते हें। यह तो रहा राजनीतिक दलों द्वारा इस मुद्दे पर विरोध।

अधिकारी भी सचेत कर चुके सरकार को
उमेश सहगल रिटायर्ड आईएएस हैं। वह दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव रह चुके हैं। बीते वर्ष उमेश सहगल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर ईवीएम के फर्जीवाड़े के खिलाफ शिकायत की। उमेश सहगल अपने पत्र में ईवीएम में किस प्रकार तकनीकी फर्जीवाड़ा किया जा सकता है उसका विस्तृत ब्यौरा सरकार को दे चुके हैं, पर न तो प्रधानमंत्री कार्यालय और न ही निर्वाचन आयोग ने मामले की गंभीरता के अनुरूप कोई
कदम उठाया है। हरिप्रसाद वेमरु नामक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रणाली के एक शोधकर्ता ने दो साल पहले ईवीएम मशीन पर कैसे मनचाहा परिणाम पाया जा सकता है का एक सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। हरिप्रसाद के इस खोजी प्रयास को पुरस्कृत करने की बजाय निर्वाचन आयोग ने उन पर ईवीएम चुराने का एक मामला बना कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। प्रधानमंत्री कार्यालय से हरिप्रसाद की गिरफ्तारी के समय
बयान आया कि कुछ विदेशी शक्तियां ईवीएम का मुद्दा उठाकर भारत को अस्थिर करने की साजिश कर रही हैं। प्रधानमंत्री ने हरिप्रसाद को समर्थन करने वाली विदेशी शक्तियों की जांच करने की आईबी और ‘रॉ’ को निर्देश भी जारी किया। हरिप्रसाद के मुद्दे पर जब न्यायपालिका ने सरकारी कार्रवाई के खिलाफ कड़ा तेवर अपनाया तब जाकर उनकी रिहाई हो सकी।

यहां प्रताड़ना, वहां पुरस्कार
भारत सरकार जहां हरिप्रसाद का दमन कर रही है वहीं सेंट फ्रांसिस्को (अमेरिका) की संस्था इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन ने बीते वर्ष हरिप्रसाद को उनकी विशेषज्ञता के लिए पुरस्कृत किया। हरिप्रसाद ने अमेरिका और नीदरलैंड के कंप्यूटर वैज्ञानिकों के सहयोग से ईवीएम के गड़बड़झाले पर ‘इंडियाज ईवीएमस आर वल्नरेबल टू फ्रॉड’ नामक शोध प्रबंध लिखा। इस शोध प्रबंध में उनको अमेरिका की
मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से अलेक्सन हाल्दरमैन ने मदद की थी। हाल्दरमैन गुजरात में एक तकनीकी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए आ रहे थे तो उन्हें दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हिरासत में ले लिया गया। चूंकि हाल्दरमैन अमेरिकी नागरिक हैं और उनको हिरासत में लेते ही अमेरिकी दूतावास सक्रिय हो गया, इसलिए उनकी दुर्गति हरिप्रसाद जैसी नहीं हुई। वर्ना
हाल्दरमैन को भी कांग्रेस प्रायोजित फर्जीवाड़े के भंडाफोड़ का परिणाम भुगतना पड़ता। इस बार नगरपालिका चुनावों में अशोक चव्हाण के जिए फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ अर्द्धापुर में हुआ है वह अर्द्धापुर चव्हाण के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र भोकर का एक अंग है। निर्वाचन आयोग के समक्ष डॉ. माधव किन्हालकर विधानसभा चुनावों में जिस अधिकारी के माध्यम से ईवीएम सेट करने का आरोप लगा चुके हैं
नपा चुनावों में भी कांग्रेस उसी की सेवा ले रही थी। इसका क्या संदेश है? यही न कि संवैधानिक तंत्र के प्रति कांग्रेस के मानस में रंचमात्र भी सम्मान नहीं। निर्वाचन आयोग के पास जिस अधिकारी के खिलाफ गंभीर शिकायत थी उसे राज्य चुनाव आयोग ने उसी इलाके में नियुक्त क्यों होने दिया? क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी आयोग की नहीं है?

चुनाव आयोग है अपंग
शिवसेना के कार्यकारी प्रमुख उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में कुछ माह पहले एक शिष्टमंडल महाराष्ट्र की मुख्य चुनाव आयुक्त नीला सत्यनारायण से मिलाथा और उस शिष्टमंडल ने ईवीएम की बजाय मतपत्र के माध्यम से चुनाव कराने की मांग की थी। तब नीला सत्यनारायण ने आश्वस्त किया था कि वह ईवीएम प्रणाली को लीकप्रूफ बना देंगी ताकि स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के चुनाव में निष्पक्ष चुनाव हो।
नीला सत्यनारायण का दावा खोखला साबित हुआ है। ईवीएम चुनाव प्रणाली का उपयोग अमेरिका और नीदरलैंड में शिकायतों के बाद बंद कर दिया गया। भारत में इसके उपयोग के प्रति दुराग्रह क्यों? अर्द्धापुर ईवीएम कांड के बाद शिवसेना के नांदेड जिलाप्रमुख हेमंत पाटील ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। ईवीएम में उम्मीदवार के सामने का बटन दबाने के बाद बीप की आवाज तो आती है पर मतदाता इस बात की
तस्दीक नहीं कर सकता कि उसने जिसे वोट डाला है वो वोट उसी के खाते में गया है। अर्द्धापुर में बीप तो समान रूप से बज रही थी, पर वोट सिर्फ कांग्रेस को मिल रहा था। हेमंत पाटील इसे असंवैधानिक करार देते हैं क्योंकि मतदाता अपने वोट के प्रति सुनिश्चित नहीं है। तुषार जगताप नामक एक एक्टिविस्ट ने दो साल पहले इस मामले में अदालत में याचिका दायर की थी। हमारा संविधान हमें गुप्त मतदान का
अधिकार देता है। ईवीएम में यह गोपनीयता खत्म हो जाती है, क्योंकि उम्मीदवार मतप्राप्ति की सूची से पता लगा लेता है कि उसे किस हिस्से में वोट मिला और कहां से नहीं। गोपनीयता भंग होने से लोकतांत्रिक प्रणाली पर प्रहार होता है। जगताप की यह याचिका भी अभी तक नक्कारखाने की तूती साबित हुई है। उड़ीसा के चुनाव परिणामों के बाद केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी ईवीएम घोटाले का आरोप
लगाया था। चुनाव आयोग के पास मतदान कराने के लिए स्वतंत्र कार्मिक इकाई नहीं है। वह पूरी तरह सरकारी कर्मियों पर निर्भर है। चुनाव अधिकारी अधिकांशतः उस राजस्व विभाग के होते हैं जो भ्रष्टाचार और सत्ताधारियों के संरक्षण पर ही निर्भर रहता है। ऐसी स्थिति में यदि ईवीएम प्रणाली को बनाए रखा गया तो चुनाव तंत्र में परिवर्तित हो चुका हमारा लोकतंत्र पूरी तरह नोट तंत्र में बदल
जाएगा, जिससे अशोक चव्हाण जैसे लोग आदर्श घोटालों का अपना परमिट हर पांचवें साल सहज नवीनीकृत कराने में कामयाब रहेंगे।
सामना से साभार

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